निर्भय: एक और मलाला बन पाती मैं
वो रात भी तारो भरी थी
मैं आखों में अनगिनत सपने लिए घूम रही थी
हर रोज़ की तरह घर लौटना था मुझे
हर छोटी सी बात माँ को बतलानी थी मुझे..........
मैं कितनी खुश थी
दिन खूब गुजरा था मेरा
हर छोटी बड़ी खुशियों को समेटे हुए
सपनो की दुनिया में लौट रही थी..........
मैं निडर, अंजान अपने आने वाले कल से
हर पल को जी रही थी
एक आज़ाद परिंदे सी
थकी उड़ान से, घरोंदे को लौट रही थी...........
मालूम ना था शिकारी बैठा है जाल बिछाए
बेखॊफ़ शिकार के अंजाम से
पलक झपकते ही झपटा मुझ पर
मानो किसी अधिकार से........
एक एक कर पंख नोंच लिए उसने मेरे
ना छोड़ा किसी उड़ान को
इतने ज़ख्म दिए उसने मुझे
ना गुंजाईश बची और ज़ख्म देने को...........
ना जाने कितनी नज़रों ने देखा उस रोज़ मुझे
पर कदम ना कोई रुके
मैं तो लड़ रही थी हालातों से
पर लाचार मुझे वो दिखे.............
कुछ लोग उम्र पूछते हैं उस शिकारी की
कुछ लोग सवाल उठाते हैं आज़ादी पर मेरी
ये कैसा दिवालियापन है सोच का
जहाँ सही गलत की कोई पहचान नहीं............
काश के जिंदा रह पाती मैं
फिर निर्भय होकर लड़ पाती मैं
ना चेहरा, ना नाम छुपाती मैं दुनिया से
एक और मलाला बन पाती मैं
निर्भय होकर लड़ पाती मैं............

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