ये जो आदत हो गयी है तेरी......
एक उम्र गुज़ारी अकेले मैंने ना आदत हुई किसी की मुझको पर जबसे आई तू करीब मेरे ना आदत रही अकेले रहने की मुझको यूँ तो आदतें और भी खराब थीं मेरी पर ये जो आदत हो गयी है तेरी...... हर रात जब भी सोया मैं करवटों ने मेरी ना ढूँढा किसी को पर सोने लगी जबसे तू करीब मेरे भर बाहों में तुझे, हो गयी सोने की आदत मुझे यूँ तो आदतें और भी खराब थीं मेरी पर ये जो आदत हो गयी है तेरी...... हर सुबह जब भी जागा मैं उगते सूरज को देखा मैंने पर जबसे जागने लगा मैं साथ तेरे हर सुबह देखने की तुझे, हो गयी आदत मुझे यूँ तो आदतें और भी खराब थीं मेरी पर ये जो आदत हो गयी है तेरी...... हर सफ़र पर चला मैं अकेला बस परछाईं मेरी रही साथ मेरे पर बन गयी जबसे तू मेरी हमसफ़र आदत चलने की हो गयी, हाथों में हाथ डाल तेरे यूँ तो आदतें और भी खराब थीं मेरी पर ये जो आदत हो गयी है तेरी...... थक हार कर लोटता जब घर मैं बना अपनी बाहों का सिरहाना, थोडा सुस्ता लेता मैं पर जबसे रखा सर मेरा तूने गोद में अपनी तेरी गोद को सिरहाना बनाने की हो गयी आदत मुझे यूँ तो आदतें और भी खराब थीं मेरी पर ये जो आदत हो गयी है तेरी...... जब कभी टूट कर ...