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एक सफ़ेद सा आँचल है वो ...........

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भर मुट्ठी में रंग ईश्वर ने जब दे मारे माटी के पुतले पर उठ खड़ी हुई एक नटखट बाला आखों में सपने, अधरों पर मीठी बोली के रंग लेकर....... सर्द मौसम की रोमानियत उसमें ग्रीष्म ऋतु की तपिश उसमें कभी पतझड़ सी टूट कर बिखर जाती है वो कभी झूल जाती है सावन के झूलों में........ नदिया सी चीर गुजर जाती है दिलों को इठलाती-बलखाती वो रास्तों में सागर सी गहरी सोच है उसकी लहरों से बिखरते जस्बात हैं उसमें....... शशि सा शीतल मन है उसका रवि सा तेज है उसके चेहरे पर उजाले की पारदर्शिता है उसमें सियाह रात सा सुकूं है भीतर......... हवाओं सी ढूँढ लेती है वो रास्ता सितारों सी फैल जाती है ज़िंदगी में बरखा सी दबा देती है वो हर धुल को माटी की सुगंध सी फ़ैल जाती है साँसों में........ क्या कहूं क्या रंग है उसका एक रंग में ना ढली है वो हर रंग में भीगा  होली सा एक सफ़ेद सा आँचल है वो...........