तू जितना मुझे भुलाएगी ...........
मैं नदिया का नीर नहीं जो बहता चला जाऊंगा मैं तो समन्द्र की लहरें हूँ लोटकर वापस आऊंगा तू जितना मुझे भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा ........ मैं रेत पर खीचीं लकीर नहीं जो पानी में मिट जाऊंगा मैं लकीर हूँ तेरे हाथों की ओर गहरा होता जाऊंगा तू जितना मुझे भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा ........ मैं कोई गुजरा वक़्त नहीं जो लोट कर ना आऊंगा शाम ढले रात बनकर सुबह उजाला बन लोट आऊंगा तू जितना मुझे भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा ........ माना के शरीर हूँ माटी का माटी में मिल जाऊंगा बनकर भीगी माटी की सुगंध हर सावन लोट आऊंगा तू जितना मुझे भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा ........ मुझे भूल पाना मुमकिन नहीं मैं इश्क हूँ , कोई बुरा सपना नहीं बंद आखों में सपना बनकर खुली आखों से नज़र आऊंगा हर कहीं तू जितना मुझे भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा सखी ........