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Showing posts from October, 2012

तू जितना मुझे भुलाएगी ...........

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मैं नदिया का नीर नहीं जो बहता चला जाऊंगा मैं तो समन्द्र की  लहरें हूँ लोटकर वापस आऊंगा तू जितना मुझे  भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा ........ मैं रेत पर खीचीं लकीर नहीं जो पानी में मिट जाऊंगा मैं लकीर हूँ तेरे हाथों की ओर गहरा होता जाऊंगा तू जितना मुझे  भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा ........ मैं कोई गुजरा वक़्त नहीं जो लोट कर ना आऊंगा शाम ढले रात बनकर सुबह उजाला बन लोट आऊंगा तू जितना मुझे  भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा ........ माना के शरीर हूँ माटी का माटी में मिल जाऊंगा बनकर भीगी माटी की सुगंध हर सावन लोट आऊंगा तू जितना मुझे  भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा ........ मुझे भूल पाना मुमकिन नहीं मैं इश्क हूँ , कोई बुरा सपना नहीं बंद आखों में सपना बनकर खुली आखों से नज़र आऊंगा हर कहीं तू जितना मुझे  भुलाएगी , मैं उतना याद आऊंगा सखी ........

लकीर का फकीर .......

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किसी सरहद से नहीं पहचान मेरी ना वाकिफ हूँ किसी धर्म से मैं मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों बस मोहोब्बत  करना जानता हूँ मैं ....... गैरों  से नहीं कोई परहेज़ मुझे ना अपनों को कोई ख़ास दर्ज़ा देता हूँ मैं मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों हर इंसा में अपना कोई ढूँढता हूँ मैं ...... कौन मंत्री, कौन संत्री, इससे नहीं कोई वास्ता मुझे ना कोई घराना पहचानता हूँ मैं मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों कर्म से इंसा को पहचानता हूँ मैं ........ क्या कामयाबी, क्या विफ़लता, मेरी समझ से हैं परे ना किसी लाचारी को पहचानता हूँ मैं मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों इंसा के जस्बे को सलाम करता हूँ मैं ..... हाथों की लकीरों में, मैं ढूँढता नहीं किस्मत अपनी ना किसी खुदा की रहमत का मोहताज़ हूँ मैं मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों जो मिला अभी तक, उसी के लायक खुदको समझता हूँ मैं .......... कहते हैं इस लकीर के परे भी है दुनिया जिसे मैं जानता नहीं मैं लकीर का फकीर ही ठीक हूँ यारों मैं सोच अपनी बदलना चाहता नहीं .....