लकीर का फकीर .......

किसी सरहद से नहीं पहचान मेरी
ना वाकिफ हूँ किसी धर्म से मैं
मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों
बस मोहोब्बत करना जानता हूँ मैं .......
गैरों से नहीं कोई परहेज़ मुझे
ना अपनों को कोई ख़ास दर्ज़ा देता हूँ मैं
मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों
हर इंसा में अपना कोई ढूँढता हूँ मैं ......
कौन मंत्री, कौन संत्री, इससे नहीं कोई वास्ता मुझे
ना कोई घराना पहचानता हूँ मैं
मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों
कर्म से इंसा को पहचानता हूँ मैं ........
क्या कामयाबी, क्या विफ़लता, मेरी समझ से हैं परे
ना किसी लाचारी को पहचानता हूँ मैं
मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों
इंसा के जस्बे को सलाम करता हूँ मैं .....
हाथों की लकीरों में, मैं ढूँढता नहीं किस्मत अपनी
ना किसी खुदा की रहमत का मोहताज़ हूँ मैं
मैं तो हूँ लकीर का फकीर यारों
जो मिला अभी तक, उसी के लायक खुदको समझता हूँ मैं ..........
कहते हैं इस लकीर के परे भी है दुनिया
जिसे मैं जानता नहीं
मैं लकीर का फकीर ही ठीक हूँ यारों
मैं सोच अपनी बदलना चाहता नहीं .....
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