कंकर से शंकर तक ...............
ना कोई जानता था , ना कोई पहचानता था
भीड़ में दबा कुचला बेजान सा
बेड़ोल बेढंग सा, मैं था पड़ा
कंकर था मैं, ना कोई नाम ना निशां था मेरा....
रोज़ महज़ जीने के लिए था लड़ता
कभी इधर, कभी उधर धकेला जाता
कहीं दफ़न होना निशचित है, मालूम था
पर फिर भी जीने की उम्मीद ना छोड़ता था
कंकर था मैं, ना कोई नाम ना निशां था मेरा....
सभी जो आस-पास थे मेरे
एक-एक कर अस्तित्व अपना खो रहे थे
मैं भी नज़र अब आने लगा था
मेरा भी वक़्त नज़दीक आने लगा था
कंकर था मैं, ना कोई नाम ना निशां था मेरा....
एक रोज़ जब आई बारी मेरी
ले जाने वाला देख मुझे चकित था
अचंभित हो, थाम लिया उसने हाथो में मुझे
शत-शत नमन किया देख मुझे उस ढेर में पड़े
कंकर था मैं, ना जाने क्या देख लिया था उसने मुझमें ....
शायद बड़े बड़ो से टकराते झूंझते
पा लिया था एक आकार मैंने
इस बेड़ोल बेढंग से कंकर में
ढूँढ लिया कोई आकार उस दिवाने ने
कंकर था मैं, ना जाने क्या देख लिया था उसने मुझमें ....
रास्तों से उठा कर बिठा दिया था उसने मुझे मंदिर में
जो हाथ फेंकते थे मुझे, आज झुक रहे थे मेरे सजदे में
कभी जिस भीड़ का हुआ करता था मैं हिस्सा
आज वही भीड़, बिछने को तैयार थी मेरे कदमों में
कंकर था मैं, ना जाने क्या देख लिया था उसने मुझमें ....
जिसे देखा नहीं कभी नज़रे उठा कर किसी ने
ईश्वर था वो आज सबकी नज़र में
बड़े बड़ो से टकरा कर, पा लिया था जो आकार मैंने
कुछ और नहीं, शंकर नज़र आया था उसमें
कंकर था में, शंकर उसने पाया था मुझमें.....
यूँ तो कंकर से शंकर हो गया मैं आज
पर भूला नहीं मैं अतीत अपना
साधू सा जीवन, साधू सी वेशभूषा, साधू से विचार
आज भी व्यवहार में है, मेरे सदाचार....
कंकर था मैं, हो गया शंकर मैं आज
ये कंकर से शंकर तक का सफ़र
मेरी उम्मीद, मेरी लड़ाई का है परिणाम
गर आप सोचते हैं, ये किस्मत है मेरी
गर आप सोचते हैं, ये इंसा का है नज़रिया
तो आप गलत हैं, किस्मत दौड़ती है साथ हिम्मत के
नज़रिया बदलता है साथ सफलता के
सो अब कंकर नहीं मैं, एक नाम है मेरा
शंकर हूँ मैं, एक पहचान है मेरी.......
Lessons for Professionals.....
1.Believe in yourself and your capabilities.
2.Keep trying and never lose hope.....Patience pays.
3.Always compete and improve yourself.
4.Talent is recognized...so be prepared for the right time and right place.
भीड़ में दबा कुचला बेजान सा
बेड़ोल बेढंग सा, मैं था पड़ा
कंकर था मैं, ना कोई नाम ना निशां था मेरा....
रोज़ महज़ जीने के लिए था लड़ता
कभी इधर, कभी उधर धकेला जाता
कहीं दफ़न होना निशचित है, मालूम था
पर फिर भी जीने की उम्मीद ना छोड़ता था
कंकर था मैं, ना कोई नाम ना निशां था मेरा....
सभी जो आस-पास थे मेरे
एक-एक कर अस्तित्व अपना खो रहे थे
मैं भी नज़र अब आने लगा था
मेरा भी वक़्त नज़दीक आने लगा था
कंकर था मैं, ना कोई नाम ना निशां था मेरा....
एक रोज़ जब आई बारी मेरी
ले जाने वाला देख मुझे चकित था
अचंभित हो, थाम लिया उसने हाथो में मुझे
शत-शत नमन किया देख मुझे उस ढेर में पड़े
कंकर था मैं, ना जाने क्या देख लिया था उसने मुझमें ....
शायद बड़े बड़ो से टकराते झूंझते
पा लिया था एक आकार मैंने
इस बेड़ोल बेढंग से कंकर में
ढूँढ लिया कोई आकार उस दिवाने ने
कंकर था मैं, ना जाने क्या देख लिया था उसने मुझमें ....
रास्तों से उठा कर बिठा दिया था उसने मुझे मंदिर में
जो हाथ फेंकते थे मुझे, आज झुक रहे थे मेरे सजदे में
कभी जिस भीड़ का हुआ करता था मैं हिस्सा
आज वही भीड़, बिछने को तैयार थी मेरे कदमों में
कंकर था मैं, ना जाने क्या देख लिया था उसने मुझमें ....
जिसे देखा नहीं कभी नज़रे उठा कर किसी ने
ईश्वर था वो आज सबकी नज़र में
बड़े बड़ो से टकरा कर, पा लिया था जो आकार मैंने
कुछ और नहीं, शंकर नज़र आया था उसमें
कंकर था में, शंकर उसने पाया था मुझमें.....
यूँ तो कंकर से शंकर हो गया मैं आज
पर भूला नहीं मैं अतीत अपना
साधू सा जीवन, साधू सी वेशभूषा, साधू से विचार
आज भी व्यवहार में है, मेरे सदाचार....
कंकर था मैं, हो गया शंकर मैं आज
ये कंकर से शंकर तक का सफ़र
मेरी उम्मीद, मेरी लड़ाई का है परिणाम
गर आप सोचते हैं, ये किस्मत है मेरी
गर आप सोचते हैं, ये इंसा का है नज़रिया
तो आप गलत हैं, किस्मत दौड़ती है साथ हिम्मत के
नज़रिया बदलता है साथ सफलता के
सो अब कंकर नहीं मैं, एक नाम है मेरा
शंकर हूँ मैं, एक पहचान है मेरी.......
Lessons for Professionals.....
1.Believe in yourself and your capabilities.
2.Keep trying and never lose hope.....Patience pays.
3.Always compete and improve yourself.
4.Talent is recognized...so be prepared for the right time and right place.
5.Be always polite....Never become arrogant with success.
sir as usual no words fr yr talent..... but sr thought is wonderful n yes the moral............
ReplyDeletevery nice sir...may god bless ur pen
ReplyDeleteawesome...
ReplyDelete:)
ReplyDeleteAshish
agar kankar shankar ban gaya to q vo unko kankar marta hai jo kankar ko shankar ka akar dete hai .
ReplyDeleteacha likha hai sir par kankar shamkar to ban gaya par abhi bhi usme kankar ki chankar baki hai.
This is really tempting & motivating poem. I had heard before the poem (BOOND JO BAN GYI MOTI)but I have never ever heard about this kind of alliance like kankkar se shankar. I'm touched.
ReplyDelete