विहान ( A New Beginning )

मैं भूल गुजरी रात का अँधेरा
एक नई सुबह से मिलने चला
मैं पलटकर अतीत के पन्ने
भविष्य का अध्याय लिखने चला
मैं विहान करने चला....

अगर ऐसा होता, तो वैसा होता
अगर ये होता, तो वो होता
मिटा इस अगर का अस्तित्व
मैं आज में जीने चला
मैं विहान करने चला....

किसने मुझसे क्या कहा
वो सब कुछ भूल, मैं आगे बढ़ा
हर हार का अनुभव संग लिए
मैं जीत की ओर चला
मैं विहान करने चला....

थामे वर्तमान की कलाई
मैं भविष्य की देहलीज़ पर खड़ा
डाल उसकी आखों में आखें
मैं उसे गले लगाने चला
मैं विहान करने चला...

अब तलक जो सोचा-समझा मैंने
वो सिर्फ मुझ तक सिमित रहा
अब सोच को अपनी, विचारो को अपने
इस जहाँ के सामने रखने चला
मैं विहान करने चला....................







Comments

  1. प्रशांत जी,
    नमस्कार!
    स्वागत है!

    आपका विहान बने अभियान!
    समय की रेत पे आप छोडें निशां!
    पूरे हों सभी आपके अरमान!
    यही मेरी नमाज़, यही आज़ान!

    बेहद खूबसूरत और गढ़ा हुआ आग़ाज़ है, जैसा की मुझे उम्मीद.... नहीं यकीन था के आप करेंगे, जब भी करेंगे!
    एक अनुरोध.... भंवर में छोड़ियेगा नहीं! फ़ूड फोर थोट देते रहिएगा!
    दिल से मुबारकबाद और शुभकामनाएँ!
    आशीष
    --
    अब मैं ट्विटर पे भी!
    https://twitter.com/professorashish

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  2. inn poetic logo ke beech main, main kuch likhon ... par kya...manager sahab aur master ji ....donno bahut achha likhte hain....haan ek baat yeh jaroor hai aap dono main ki hindi aur urdu donno ko use karte hain...agar galat hai toh na kare..agar sahi hai toh phir why not english words as well.

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  3. its just awesum..........we r proud of you....

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